क्या सच में ताजमहल बनवाने के बाद शाहजहां ने कारीगरों के हाथ कटवा दिए थे? जानिए इतिहास क्या कहता है
ताजमहल से जुड़ी सबसे चर्चित कहानियों में एक यह भी है कि मुगल बादशाह शाहजहां ने इसे बनाने वाले कारीगरों के हाथ कटवा दिए थे, ताकि दुनिया में दोबारा कोई ऐसी इमारत न बन सके। यह दावा वर्षों से किताबों, फिल्मों, सोशल मीडिया और लोककथाओं के जरिए लोगों के बीच प्रचलित है। लेकिन क्या इतिहास इस बात की पुष्टि करता है? आइए जानते हैं इस लोकप्रिय दावे की सच्चाई।
हास इस बात की पुष्टि करता है? आइए जानते हैं इस लोकप्रिय दावे की सच्चाई।
“कितने हाथों ने तराशे ये हसीं ताजमहल,
झांकते हैं दर-ओ-दीवार से क्या-क्या चेहरे…”
— शायर जमील मलिक
यह शेर ताजमहल की खूबसूरती के साथ-साथ उसे बनाने वाले हजारों कारीगरों की मेहनत और हुनर को भी श्रद्धांजलि देता है। दुनिया के सात अजूबों में शामिल ताजमहल आज भी प्रेम, कला और बेमिसाल शिल्पकला का प्रतीक माना जाता है। हालांकि, इसकी भव्यता जितनी प्रसिद्ध है, उससे जुड़ा यह दावा भी उतना ही चर्चित है कि शाहजहां ने निर्माण पूरा होने के बाद कारीगरों के हाथ कटवा दिए थे।

क्या सच में कारीगरों के हाथ कटवाए गए थे?
इतिहासकारों के अनुसार, इस दावे का समर्थन करने वाला कोई समकालीन और विश्वसनीय ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है।
मुगलकालीन दस्तावेजों, तत्कालीन सरकारी अभिलेखों और भारत आए यूरोपीय यात्रियों जीन-बैप्टिस्ट टैवर्नियर तथा फ्रांस्वा बर्नियर के यात्रा-वृत्तांतों में कहीं भी यह उल्लेख नहीं मिलता कि शाहजहां ने ताजमहल बनाने वाले कारीगरों के हाथ कटवा दिए थे।
इतिहासकार क्या कहते हैं?
आजतक रेडियो से बातचीत में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के इतिहास विभाग के पूर्व चेयरमैन और मध्यकालीन इतिहास के विशेषज्ञ प्रोफेसर सैयद अली नदीम रिज़वी ने कहा कि यदि किसी को रोकना ही होता, तो कारीगरों के नहीं बल्कि वास्तुकार (आर्किटेक्ट) के हाथ काटे जाते, क्योंकि इमारत का मूल डिजाइन वही तैयार करता है। कारीगर तो उसी डिजाइन के अनुसार निर्माण कार्य करते हैं।
उन्होंने यह भी बताया कि ताजमहल के निर्माण के बाद भी कारीगरों को वेतन मिलता रहा और उनके भुगतान से जुड़े दस्तावेज उपलब्ध हैं। आगरा के ताजगंज इलाके में आज भी कई परिवार खुद को उन कारीगरों का वंशज मानते हैं और पारंपरिक शिल्पकला से जुड़े हुए हैं।
अगर हाथ काट दिए गए होते, तो आगे की इमारतें किसने बनाईं?
इतिहासकारों का कहना है कि ताजमहल बनने के बाद भी कई कारीगर मुगल साम्राज्य की अन्य निर्माण परियोजनाओं में काम करते रहे। इन्हीं में शाहजहानाबाद (पुरानी दिल्ली), लाल किला और जामा मस्जिद जैसी ऐतिहासिक इमारतें शामिल हैं।
यदि सभी कारीगरों के हाथ काट दिए गए होते, तो इन भव्य निर्माण कार्यों को अंजाम देना संभव नहीं होता। यही वजह है कि यह कहानी उपलब्ध ऐतिहासिक रिकॉर्ड से मेल नहीं खाती।

ताजमहल की असली कहानी
ताजमहल का निर्माण मुगल सम्राट शाहजहां ने अपनी पत्नी मुमताज महल की याद में कराया था। इसका निर्माण वर्ष 1632 से 1653 के बीच हुआ और इसमें लगभग 20 हजार कारीगरों और मजदूरों ने भाग लिया।
संगमरमर पर की गई बारीक नक्काशी, कीमती पत्थरों की जड़ाई और उत्कृष्ट वास्तुकला ने ताजमहल को दुनिया की सबसे प्रसिद्ध इमारतों में शामिल कर दिया।
बीबीसी की एक रिपोर्ट के अनुसार, निर्माण कार्य में बड़ी संख्या में मजदूर कन्नौज क्षेत्र से आए थे, जबकि राजमिस्त्री, पत्थर तराशने वाले, बढ़ई, चित्रकार और अन्य विशेषज्ञ कारीगर मुगल साम्राज्य के विभिन्न हिस्सों के अलावा मध्य एशिया और ईरान से भी बुलाए गए थे।
फिर यह कहानी फैली कैसे?
मुगल वास्तुकला की प्रसिद्ध विशेषज्ञ एब्बा कोच इस कहानी को “Guides’ Tale” यानी पर्यटक गाइडों द्वारा सुनाई जाने वाली लोककथा मानती हैं। उनके अनुसार, दुनिया के कई प्रसिद्ध स्मारकों के साथ ऐसी कहानियां समय के साथ जुड़ जाती हैं।
वहीं इतिहासकार एस. इरफान हबीब के अनुसार, यह कहानी विशेष रूप से 1960 के दशक में अधिक लोकप्रिय हुई। उनके मुताबिक, इस दावे के समर्थन में कोई विश्वसनीय ऐतिहासिक साक्ष्य उपलब्ध नहीं है और किसी प्रतिष्ठित इतिहासकार ने इसे प्रमाणित तथ्य के रूप में स्वीकार नहीं किया है।

निष्कर्ष
आज उपलब्ध ऐतिहासिक दस्तावेज, समकालीन विवरण और इतिहासकारों के शोध इस बात की पुष्टि नहीं करते कि शाहजहां ने ताजमहल बनाने वाले कारीगरों के हाथ कटवा दिए थे।
इसलिए इस दावे को स्थापित ऐतिहासिक तथ्य नहीं, बल्कि एक लोकप्रिय मिथक माना जाता है। ताजमहल की सबसे बड़ी पहचान किसी क्रूर कहानी से नहीं, बल्कि उन हजारों कारीगरों की कला, मेहनत और अद्भुत शिल्पकला से है, जिन्होंने इसे दुनिया की सबसे खूबसूरत धरोहरों में शामिल किया।
Fact Check:
दावा: शाहजहां ने ताजमहल के कारीगरों के हाथ कटवा दिए थे।
सच्चाई: उपलब्ध ऐतिहासिक दस्तावेज और अधिकांश इतिहासकार इस दावे की पुष्टि नहीं करते। इससे पाठक को शुरुआत में ही स्पष्ट उत्तर मिल जाता है।
